लैंसडाउन -एक स्वर्ग

वॉर मेमोरियल, लैंसडौन

लेखक- सुमित सिंह

आजकल हर कोई शहर की भीड़-भाड़ से दूर एक ऐसी जगह पर जाना चाहता है जहाॅं वह जिंदगी  के दो पल अपने परिवार के साथ हॅंसी-खुशी बीता सके। खासकर तब जब सूरज आपके सिर पर आ खड़ा हो और उस वक्त अगर कोई ऐसी जगह मिल जाए जहाॅं आपको पल भर के लिए सुकून मिले तो वो जगह किसी स्वर्ग से कम नही कहलाएगी। इसमेें कोई दो राय नही कि लैंसडाउन जैसी जगह पर जाकर आपको वो सब ना मिले जैसा आप चाहते हो।

‘‘लैंसडाउन की तरफ जाने वाला मार्ग’’

लैंसडाउन का सफर अपने आप में ही रोमांच से भरपूर है खासकर गर्मियों के महीनों में जहाॅं दूसरी जहगों पर सूरज आग उगल रहा होता है और यहाॅं ठण्ड़ी शीतल हवा आपके गालों को छू रही होती है। एक के बाद एक घुमावदार आती सड़कें, सड़क किनारे लगे चीड़ के पेड़ और बादलों को छूती उनकी शाखाएं लगता है जैसेें जन्नत की राह पर निकल पडे़ हो। जैसे-जैसे लैंसडाउन से दूरियाॅं कम होती जाती हैं वैसे-वैसे कुछ नया देखने की चाह में दिल की धड़कने बढ़ती जाती है।

दरबान सिंह संग्रहालय
वॉर मेमोरियल, लैंसडौन
लैंसडौन, गढवाल राइफल का मुख्य केन्द्र है यह मुख्यतः छावनी क्षेत्र है। प्रायः लैंसडाउन को आम बोलचाल में ‘‘काल्यों’’/कालौंडांडा के नाम से भी जाना जाता है। जैसे ही लैंसडाउन में प्रवेश करते हैं बड़े -बड़े सैनिकों के साइन बोर्ड दिखाई देते है और उनमें लिखे उनके शौर्य और वीरता के किस्से पढ़कर दिल में नया जोश भर जाता है। यह क्षे़त्र बांझ के पेड़ों से घिरा होने के कारण जहाॅं तक नजरे दौड़ाओ हर तरफ बांझ के ही पेड़ दिखाई देते है और इसी वजह से यहाॅं के वातावरण में ठण्ड़क है।
जैसे ही बाजार की तरफ मुड़ते है उस मोड़ से देखने पर लैंसडाउन तकरीबन पूरा दिखाई देता है और दिल करता है कि लैंसडाउन एक मुट्ठी में समेट लिया जाए। सीढ़ीनुमा बने घर ऐसे लगते हैं जैसे ताश के पत्तों को एक के ऊपर एक जमा कर रखा हो और उन्हे अलग-अलग रंगों से रंग दिया हो। धीरे-धीरे बाजार की तरफ बढ़ने पर एक के बाद एक दिखाई देती लकड़ी की बनी दुकानें। सब कुछ पुराने जमाने की याद ताजा करता है जैसा टेलिविजन में देखा करते थे। इस दौरान देश-विदेश से आए सैलानियों के आने से बाजार में काफी चहल-पहल हो जाती है। भीड़ भी भीड़ ना लग कर लगता है मानो अपने घर के ही लोग हो क्योंकि लोगों का एक अच्छा व्यवहार भी उस जगह पर बार-बार आने को मजबूर करता है लेकिन ना जाने वहाॅं की हवा में क्या घुला है जो एक बार आने के बाद भी लोग बार-बार आना पसंद करते है। कहने को तो वहाॅं एक बाजार है लेकिन बाजार के नाम पर नीचे जाती हुई एक सडक है जिस पर सटी कई दुकानों पर दिनचर्या मे काम आने वाले सभी घरेलू साजो-सामान मिल जाते है।
लैंसडाउन बाजार

लैंसडाउन क्षेत्रफल की दृष्टि से छोटा हाने के कारण यहाॅं की सभी जगहों को पैदल ही घूमा जा सकता है। इस तरह प्रकृति को करीब से देखने और ताजी हवा में सांस लेना का भी मौका मिल जाता है। वहाॅं से कुछ ही मीटर की दूरी पर ‘‘भुल्ला ताल’’ झील स्थित है। पहाडों के बीच ऐसा नजारा देख किसी सपने जैसे लगता। झील में तैरती रंग बिरंगी छोटी-छोटी नावें लगता है जैसे किसी ने रंगों को पानी में घोल दिया हो। उनमें बैठ कर आनन्द लेते लोग और उनकी तस्वीरे खींचते उनके दोस्त यही क्रम लोग बार-बार दोहराते और अपनी यादों में एक और याद जोड़ते  चले जाते हैं। झील में तैरती सफेद बतखें मोतियों के समान प्रतीत होती हैं। चारो तरफ से पहाडों से घिरा होने के कारण झील की लम्बाई ज्यादा नहीं है।

भुल्ला ताल झील

इस तरह आगे बढ़ते हुए कुछ ही कदमों पर ‘‘टिप-इन-टोप’’ तक पहुॅंच जाते है। ऊॅंचाई में होने कारण यह लैंसडाउन में सबसे लोकप्रिय जगहों मे से एक है। यहाॅं से देखने पर दूर-दूर तक सिर्फ पहाड़ ही पहाड़ दिखाई देते है और उन पहाड़ों में बसे गावों को देखने पर ऐसा लगता हैे ‘‘जैसे कोई हरी चूंनड़ ओड़ कर बैठा हो और छोटे-छोटे गाँव को बच्चों की तरह गोद मे लिए हो।’’ यहाॅं से हिमालय पर्वत की गगनचूंबी चोटियों को आराम से देखा जा सकता है। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियाॅं भी खिलौनों की तरह दिखाई देती है। यह देख कर आश्चर्य होता है कि किस तरह से इन दुर्गम और पत्थरीलें पहाड़ों पर सड़कों का निमार्ण किया होगा। यहाॅं से नीचे की ओर दिखने पर एक गहरी खाई है जिसे देख कर दिल दहल सा जाता है। ऐसे मनोहर दृश्य को देखकर जी चाहता है कि इसी तरह यहाॅं बैठे रहे और इसी खुबसूरत नजारे को निहारते रहें। यहाॅं पर आने तक थकान जरूर लगती है पर ऐसा नजारा देखते ही सबकी थकान दूर हो जाती है। यह देखकर लगता है कि प्रकृति, भगवान का दिया सम्पूर्ण मानवजाति को एक ऐसा उपहार है जिसकी हम सभी को रक्षा और देखभाल करनी चाहिए। अगर इसी तरह हम अपने मामूली से स्वार्थ के लिए इन्हें तबाह करेंगे तो प्रकृति भी हमें उसी तरह तबाह कर देगी। जिसका परिणाम हम आजकल समाचारों में देख ही रहे हैं।

टिप-इन-टोप से दिखाई देती हिमालय की चोटियाॅं

यहाॅं से कुछ ही कदमों की दूरी पर सेेंट मैरी चर्च है। जिसके अन्दर ही एक छोटा सा संग्रहालय है जिसे देखकर अनुमान लगाया जा सकता है कि इसका निमार्ण कब किया होगा। चर्च में एक ‘‘विलिंग वैल’’ है। लोगों की ऐसी आस्था है कि अगर इसमें सिक्का गिरा कर मन्नत माॅंगी जाए तो वो जरूर पूरी होती है। चर्च बाहर से जितना खूबसूरत दिखाई देता है उतना ही अन्दर से भी खूबसूरत है। अंदर की बनावट  को देखकर पता चलता है कि उस वक्त के काम में कितनी मजबूती थी जो सालों साल तक अभी तक टिका हुआ है।

सेेंट मैरी चर्च (बाएं) और कैथोलिक चर्च (दाएं)
थोड़ा आगे चलते ही एक कैथोलिक चर्च है। जिसकी बाहरी दीवरों पर लिखी ज्ञानवर्धक बाते जो सभी का ध्यान अपनी ओर खींचती हैं। यहाँ की हर जगह अपने आप में एक खूबसूरती लिए हुए है जो हमें प्रकृति के करीब लाती है चाहे वो बहता पानी हो या फिर बहती हवा या फिर पेड-पौधे हो। इन तीनों का संगम एक ही जगह पर मिलना अपने आप में ही अतुल्य है। लैंसडाउन का पूरा वातावरण शांतिमय है जो दिल और दिमाग को सूकून देता है। चारो तरफ बांझ के पेड़ों से घिरा होने कारण गर्मी के मौसम में भी ठण्ड का एहसास करवाते है। लैंसडाउन को इस तरह करीब से देखना दिल की गहराईयों में अपने आप को ढूंढने जैसा है जिसे हमने बरसों से शहर की भीड़ में खो दिया है। एक बार यहाॅं घूमने के बाद हर किसी के दिल में यह इच्छा जरूर आती है कि वो लैंसडाउन को अपने साथ ले जाए पर ऐसा तो नामुमकिन है लेकिन वो यहाॅं की अच्छी यादों को साथ जरूर ले जा सकता है जिन्हें याद कर वह फिर से वही एहसास को महसूस कर सके। कहने को तो काफी कुछ है लेकिन जितना भी कहूॅं उतना कम ही लगता है।

अगर सीमित शब्दों में कहना हो तो यह कुछ पंक्तियाॅं है जो लैंसडाउन को आपसे रूबरू करवा सके।

दिख रहा नजारा धॅूंधला-धॅूंधला सा
लडखड़ाते हुए जरा मैं संभला,
अभी तो उजाला था हो गया अंधेरा
कोहरे की चाद्दर ने ढ़क दिया लैंसडाउन सारा ।।

लेखक- सुमित सिंह

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