सुरीलौ उत्तराखंड, रंगीलौ उत्तराखंड

लेख़क
सुधीर जुगरान

“उत्तराखंड” जो गंगा जैसी महान नदी का उद्गम स्थल है, अपने आप में अनेक सांस्कृतिक कलाओं एवं परम्पराओं को समेटे हुए है। यहाँ की लोक कलाएं, धार्मिक संस्कार, भाषा, वेशभूषा, और खानपान यहाँ आने वाले सैलानियों का मन मोह लेते है। लोक संगीत ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा किसी भी क्षेत्र विशेष की संस्कृतिक विरासत को मनोरंजक तरीके से जाना जा सकता है। पारंपरिक लोक वाद्यों के साथ जब उत्तराखंड के लोक गीत गाये जाते तो धरती पर स्वर्ग की अनुभूति होती है। उत्तराखंड के लोक गीतों को कई प्रकारों मैं विभक्त किया जा सकता है। जिनमें कुछ प्रमुख प्रकार है:

जागर गीत: उत्तराखंड के धार्मिक अनुष्ठानो में देवी देवताओं के आवाहन के लिए जो गीत सम्मान रूप में गाये जाते है उन्हें जागर गीत कहते है। पांडव, भैरवनाथ, गोलू, गढ़देव आदि देवताओं के जागर उत्तराखंड राज्य में प्रमुख है।

प्रेमगीत: प्रेमगीतों में चौफला और झुमैलो गीत प्रसिद्ध है। झुमैलो गीत नारी ह्रदय की वेदना और उसके प्रेम को अभिव्यक्त करता है। चौफला गीत में स्त्री सौंदर्य के साथ ही चारों कामनाओं (धर्म, अर्थ, काम, मोह) का वर्णन होता है।

नृत्यगीत: भगनौल गीत और तांदी गीत अक्सर उत्तराखंड के उत्सवों में सुन ने को मिलते है। भगनौल कुमाऊँ क्षेत्र में गाया जाने वाला स्त्री की प्रेम कल्पनाओ को उजगार करता गीत होता है। तांदी गढ़वाल क्षेत्र में विशिष्ट मौकों पर गाया जाने वाला गीत है। तांदी गीत में तात्कालिक घटनाओं, प्रसिद्ध व्यक्तियों के कार्यों का उल्लेख् होता है।

उत्तराखंड के शांत, सरल स्वाभाव वाले अनेक लोक कलाकारों ने लोकगीतों और लोक वाद्यों को सहेजने में अपना योगदान दिया, उन में पद्मश्री बसंती बिष्ट जी आज किसी के परिचय की मोहताज़ नहीं है। उत्तराखंड के लोक गीतों को केवल सुनना ही काफी नहीं, उन गीतों में उकेरे गए भाव , गायन शैली और भाषा को समझना भी अति आवश्यक है।

आशा है अब आप जब भी उत्तराखंड आएंगे तो यहाँ के लोक गीतों का आनंद लेना नहीं भूलेंगे।

लेख़क
सुधीर जुगरान

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