Uttarakhand Stories

Migration: Boon or Bane?

by Manoj Bhandari
Oct 26, 2015

Result of Facebook Daily Contest #24

And the winners is:

Uttarahand Online Fest 2015

Prabhakar Bhatt

“Kasturi kundal base mrig dhunde van mahi ” यही है हमारे पहाड़ की कहानी| हमें इस बात की बिल्कुल भी क़द्र नहीं है की हम ऐसे भूमि से जुड़े हैं जो सोना उगलती है| सोना का तातपर्य यहाँ होने वाली पसलें , जड़ी बूटिया और यहाँ का सुन्दर वातावरण| ये आवस्यक नहीं है बाहर जाने वाले हर एक आदमी सफल है| पलiयन करने वालों में से २०% लोग अच्छी जिंदगी जीते हैं ७०% संघर्ष वाला और बाकि १०% वो लोग हैं जिनका वहां भी वही हाल है जो यहाँ है |

पलायन का सबसे बड़े कारण:
१ – उत्तम शिक्षा का अभाव / दिनों दिन शिक्षा का गिरता स्तर।
२ – ग्राम से शहर , आवागमन हेतु उचित संसाधनों का अभाव / ग्रामीण क्षेत्रों में उचित सड़क संसाधनों का अभाव।
३ – उचित चिकित्सा व्यवस्था का अभाव / चिकित्सा व्यवस्था का गिरा हुवा स्तर।
४ – अधिकांश पहाड़ी लोगों की स्वार्थी प्रवृत्ति।
५- बेरोजगारी।
६ – पहाड़ियों का संकोची स्वभाव ।

इनमे से सबसे बड़ा कारण है शिछा जो की अपने पतन की और जा रही है| कोई भी ऐसा विदयालय नहीं है जहाँ पढ़ाई का इस्तर सही हो और नक़ल न होती हो, परिणाम स्वरुप बच्चे कोई भी एग्जाम क्लियर नहीं कर पते हैं और बेरोज़गार हो जातें हैं| जिसने नक़ल का सहारा कभी अपनी जिंदगी में नहीं लिया वो आज सफल है चाहे नौकरी देर से ही मिली हो| १० एवं १२ हमारी उच्चतम श्रेणी रह गई है फिर नौकरी मिले भी तो कैसे? अगर सिक्छा का स्तर सुधर जाये तो सब एकदम सही हो जाएगा जैसेकि भरस्टाचार, रिस्वतखोरी , कालाबाज़ारी और शोषण क्यूंकि ये वही लोग फैलाते हैं जिनके पास योग्यता नहीं है| भारत एक सम्पन्नं देस हैं लेकिन यहाँ के योग्य युवा विदेशों में काम कर रहे हैं अगर वो सभी अपना कौसल भारत को दें तो भारत जल्दी ही विकसित हो जायेगा और यही हाल हमारे पहाड़ का भी है|

Besides the above winners, we also found the following comments worth appreciation:

अलबेला मस्त पहाडी

हर किसी का सोचना अलग अलग होता है दोनों बातें अपने आप में सही साबित भी होती है कही ना कही तरक्की की है । मगर जिस तरक्की ने दो घर आबाद करने गाँव से एक आदमी का नाम रोशन हो और पूरा गाँव बर्बाद हो जाए उसे कौन अच्छा कह सकता है पलायन करने वालो ने अगर मुढ़कर देखा होता वहा की शुध ले होती तो हम जरुर कहते हां पलायन से अच्छा हुआ विश्व में नाम हुआ गाँव उजड़ने के बाद नाम हो तो ऐसा नाम किसको प्रिय होगा ।। पलायन श्राप था श्राप है और रहेगा ।।

Kishan Bhandari

पलायन ना ही श्राप है और ना हीं इससे हमे कोई कामयाबी मिली, पलायन के कई कारण हैं:-
1. गाँव तक मूलभूत सुविधाओं का न पहुँचना सबसे बड़ा कारण रहा है, इसके कारण लोगो ने शहरों की शरण ली और देखा देखी में परिवार गाँव से गायब होने लगे।
2. हर कोई अच्छी सुविधायें च
ाहता है, खासकर आज की पीढ़ी सुविधाओं से भरी जगह पर रहना ज्यादा पसंद करती है।
3. युवाओं के लिए जॉब की कमी या यूँ कहे की बेरोजगारी के चलते युवाओं को शहरों की ओर ना चाहते हुए भी जाना पड़ता है और कुछ समय के बाद ही शहरों में बसना ही मजबूरी बन जाती है।

अगर उत्तराखंड को विश्व स्तर पर जाना जाता है तो वहाँ के गाँव की वजह से, उत्तराखंड की सुंदरता गाँव से है,।

Mayank Rawat

आदमी अपने व्यक्तिगत विकास के लिए पलायन करता है। ये जरुरी भी है। इसे हम श्राप नहीं कह सकते। यदि आप इतिहास पर नजर डालें तो आप पाएंगे कि मनुष्य अपने विकास के लिए एक जगह से दूसरी जगह पलायन करता रहा है। और मेरा मानना है कि ऐसा होता भी रहेगा। इंसान के विकास में ही किसी राज्य का, राष्ट्र का तथा सभ्यता का विकास है। लेकिन जहाँ तक पहाड़ों में पलायन की समस्या की बात है, उसमें हमें एक अलग नजरिये से सोचना पड़ेगा। मेरा मानना है कि आप बेहतरी के लिए बाहर जाएँ लेकिन अपनी मातृभूमि को कभी न भूलें। जिस भी तरीके से आप अपनी मातृभूमि का विकास कर सकते हैं उस तरीके से मदद करें। अपना योगदान दें। अपनी जन्मभूमि को कोई नहीं भूल सकता। आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्मित फ़िल्म “स्वदेश” में भी यही सन्देश दिया है कि आप जहाँ भी जाएँ आपकी मातृभूमि को आप कभी भी नहीं भूलते। इसीलिए आपको अपना विकास तो करना ही है लेकिन अपनी मातृभूमि को नहीं भूलना है। लौट कर आना ही है इसके पास ताकि इसका भी विकास हो। और यदि हम नौकरी के लिए या सुविधाओं के लिए कहीं बाहर जा रहें हैं तो भी हमें कोशिश करनी है कि हम अपनी मातृभूमि से जुड़ें रहें अथवा ऐसा प्रयास करें कि अपनी मातृभूमि में ही वो सब सुविधाओं मुहैया करवा पाएं। आपको निर्णय लेकर शुरुआत करनी ही होगी।
अंत में स्वदेश फ़िल्म की इस गाने की कुछ पंक्तियाँ लिखना चाहूँगा

ये जो देश है तेरा
स्वदेश है तेरा
तुझे है पुकारा
ये वो बंधन है
जो कभी टूट नहीं सकता।

Himanshu Bisht

हमेशा से ही हर व्यक्ति अपना भविष्य को लेकर चिंतित रहा है । पर उत्तराखंड में मुलभुत आवश्यकताओं की कमी या सरकार की उनदेखि तथा जनता के प्रति सकारात्मक कार्यों का न होने से लोगों को दिन प्रतिदिन पलायन की तरह अग्रसर होना पढ़ रहा है – जहा एक ओर लोग इसे श्राप मानते है । वही दूसरी ओर पलायन करके लोगों ने अपने भविष्य को उजागर भी किया है । तथा देश विदेश में उत्तराखंड का नाम रोशन किया है ।

जहा तक मेरा विचार है में इसको श्राप नहीं मानता हु तथा सरकार की जनता के आवश्यकताओं और उत्तराखंड के विकास के प्रति उनदेखि इसका मुख्य कारण है । आशा है हमी सभी लोगों को इस पलायन को रोकने के लिए उत्तराखंड में ही लघु और कुटीर उद्योंगो का विस्तार करने के लिए सरकार को हर संभव दबाव डालना पड़ेगा । यही एक उपाय उत्तराखंड की संस्कृति और प्रकृति को बनाये रख सकती है ।

Nidhi Mathpal

मैं पलायन का न तो समर्थन करती हूँ और न ही विरोध। आज हर व्यक्ति वर्ग अपनी आजीविका के स्तर को बढ़ाना चाहता है। अच्छी शिक्षा उच्च जीवनशैली अच्छा रहन-सहन अच्छे संसाधनों के लिये पहाड़ के लोग पलायन के लिए मजबूर है। और दूसरी तरफ पलायन कर दूसरे शहरों या देश में गये लोग हमारी संस्कृति, कला, भाषा को अन्य शहरों व विदेशों में भी जीवित रखा है। इस समस्या के लिए किसी व्यक्ति विशेष को दोष देना गलत है क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने घर को छोड़ कर नहीं जाना चाहता है। यदि हमें सारी सुविधाएं घर में ही उपलब्ध हो जाएं तो हम बाहर क्यों जाएंगे। और बाहर निकल के अपने घर को भूल जाएं तो घर का विकास कैसे करेंगे।

Sanjay Pathak

ये माना कि सरकारी उदासीनता और भ्रष्ट राजनेताओं ने पहाड़ को हमेशा हासिये पर रखा…लेकिन ये भी सच है कि बावजूद इसके पहाड़ की मिट्टी और देवों के आशीष ने हमेशा पहाड़ से प्रेम करने वाले और वहाँ रहने वालों को खुशी दी है | पलायन की जो बाढ़ पिछले 15 सालों में आयी है वह व्यक्ति की अति महत्वकांशा का परिणाम मात्र है | पहाड अगर बेकाम के होते तो दिल्ली मुम्बई के लोग यहाँ आकर यूँ ही करोडों की जमीन न खरीदते…
आज स्थिति यह है कि पहाड़ की मिट्टी और देवता को अपने घरछोडू बच्चों को वापस पहाड़ बुलाने के लिये जागर और पूजा का सहारा लेना पडता है…अपने मन से तो वो आने से रहे…

Ravindra Singh Kaneri

मनुष्य आदि काल से ही निरंतर स्थान परिवर्तित करता रहा है। पलायन को हम पूर्ण रूप से नहीं रोक सकते किन्तु इसे कम किया जा सकता है।पहाड़ी संस्कृति को विश्व तभी जानेगा जब हम घरों से बाहर निकलेंगे लेकिन साथ ही हमें पहाड़ में अपनी जड़ों को जमाये रखना है।यदि हमें समाज में अपनी पहचान बनानी है तो हमें आधुनिक समाज से समन्वय रखना होगा।सोशल मीडिया पर आप एवं अन्य लोगों द्वारा किये गये सराहनीय प्रयास भी आधुनिक तकनीकि से समन्वय ही है। हमारी व्यक्तिगत आवश्यकताऐं एवं अभिलाषायें भी पलायन का कारण हैं।

Mahesh Khetwal

जो बोलते है… हमने शहरो में बसके उत्तराखंड को पहचान दिलाई है। हाँ ये बात सही है उन्होंने उत्तराखंड को पहचान दिलाई है, वहा की संस्कृति, रहन सहन, खान पान और पहनावा सब कुछ बताया है शहर वालो को। पर क्या कभी उन्होंने पहाड़ की तरफ मुड़के देखा??? उन्होंने वहा बस अपनी तरक्की करी है। अपने बच्चों को पढ़ाया है लिखाया, प्रॉपर्टी जोड़ी। बस उन्होंने अपनी ही तरक्की की है। कभी उन्होंने अपने गाँव की सुध नही ली। उन लोगो ने अपने गाँव की तरक्की के लिए आवाज़ नही उठाई। हा ये बात है सही सरकार ने गाँव तरफ ध्यान नही दिया, मुलभूत जरुरतो को पूरा नही किया। मजबूरन उन्हें पलायन होना पड़ा, रोजगार और बच्चों की पढाई लिखाई के लिए। लेकिन वो लोग आज भी शहर में रह रहे है, बच्चों को पढ़ाने और लिखाने के बाद भी। उन्हें गाँव आना चाहिए और गाँव की तरक्की के लिए आवाज़ उठाना चाहिए।

Urmila Uniyal Kaul

पलायन उत्तराखंड के लिए खासकर गांवों के लिए एक श्राप है पर एक परिवार व व्यक्तिगत के लिए नहीं क्योंकि उनके लिए यह बुनियादी जरूरतों की मांग थी जैसे कि;
1- रोजगार के न समान अवसर,
2-बिजली, पानी, शिक्षा, चिकित्सा, यातायात जैसे मूलभूत सुविधाओं का अ
भाव
3- अत्यंत संघर्षरत जीवन, सीमित आय, कम कृषि उपज
4- और सबसे महत्वपूर्ण सरकार की नजरअंदाजी तथा उदासीनता राज्य की उन्नति को लेकर ।

उत्तराखंड के लोगों ने बाहर निकल कर न सिर्फ स्वंय के लिए कामयाबी हासिल की है बल्कि उत्तराखंड का नाम , संस्कृति , पर्यटन को राष्ट्रीय एवं विश्व स्तर तक ले गए हैं.
आज हम हर field, armed forces , civil & service sector, sports, cinema, business, shipping जैसे कई जगहों पर अपना स्थान बनाने मे सफल हुए हैं और किसी भी उत्तराखंडवासी को वहां देखकर हर्ष और गौरव महसूस करते हैं । जो शायद राज्य के मौजूदा हालात में इतना संभव न हो पाता ।

ये मंच जहां हम सब अपने राज्य एवं संस्कृति को बढावा दे रहे हैं एक सटीक उदाहरण है ।

Renuka Chaturvedi

Palayan ek chinta ka vishay hai
Uttrakhand main jitni bhi samaysaye hai (jashe rojgar ,education) other
samaysaye Jo hai unka samadhan palayan nahi hai


Agaar ishe tarah palayan chalta raha to aane wale kuch samay baad uttarakhand ek viran khandar ki bhati partite hoga.

Is gambhir samayasa se niptne ke liye sabhi logo aage aana hoga

Iske kuch samadhan is prakar ho sakte hai
1-yuwa varg ke liye rojgar ke awsar uplabhah karey jaye yuwa varg hi bhavisay ki disha nirdharit karta hai

2- kishano ko takniki aur arthik roop se sahayata uplabhad karayi jaye. Jisshe kishano ko bhi apna ujwal bhavishy dikh sake.

3-paraytan uttrakhand ka sabse satwopari aay ka sorot ban sakta hai jiske liye sarkar aur aam varg dono ko sahyog karana padega .sarkar waha subidhay uplapdh karaye aur aam niwasi uan subhidhao ka paryog karte hue parytan aur parytak ko badawa de

Hamara pyara uttrakhand aane wale ujwal bhavishay ki kamna karti hui.

Anwita Patli Negi

Ironically we believe advancement and growth are ‘wearing western clothes, speaking English, living in metropolitan cities, adopting western thoughts, lifestyle, salary in lakhs, having cars, flats and all luxuries. To attain all these, people migrate from their homes and make their new world in metro cities. But, growth and advancement is something else, it happens when you stay at your home with all the facilities of education, health, transport and livelihood. Advancement is when you don’t have to migrate and work at your place. For this agriculture should be promoted, advanced techniques should be applied and youngsters should be encouraged to put their efforts in agriculture. There will be no advancement unless agriculture is promoted and migration stops.

Gaurav Rastafari Sharma

मैँ तो पहाड़ हूँ,मैँ रो भी तो नहीँ सकता (पहाड़ की कहानी पहाड़ की जुबानी)~ अरे अब तुम भी जा रहे हो खैर, चले जाओ,मुझे अफसोस नहीँ होगा। अपनी गठरी बाँधे, एक,एक कर मैँने सबको जाते देखा अब तुम भी जा रहे हो चले जाओ,मुझे अफसोस नहीँ होगा। मैँ पत्थर का जरूर हूँ,पर मैँ तुमसा पत्थरदिल नहीँ। मैँ जाऊँ भी तो कहाँ,मेरी कोई और मँजिल भी तो नहीँ। तुमने आरोप लगाए मेरी छाती सूख गई,ये तुम्हेँ अब अम्रत नहीँ देती। तो मुझे बतलाओ,,अपनी बूढ़ी माँ को भी कल क्या तुम यूँ ही बँजर छोड़ चले जाओगे। तुमने बौखला कर कहा मेरी गोद कमजोर पड़ गई,ये अब तुम्हेँ सुकून नहीँ देती। तो मुझे ये बतलाओ,अपने बूढ़े पिता को भी कल क्या तुम यूँ ही मरता छोड़ चले जाओगे। अपनी कविताओँ मेँ अकसर,तुम मुझे मुस्कुराता बतलाते हो। फिर क्योँ मुझे तुम सब,यूँ तन्हाँ छोड़ चले जाते हो। अपनी कविताओँ मेँ तुम्हेँ जो देवदार झुमते प्रतीत होते हैँ दरअसल वो बाहेँ फैला तुम्हेँ वापस बुला रहे होते हैँ। जो झील,गदेरे तुम्हेँ स्वर्ग से प्रतीत होते हैँ दरअसल वो पानी नहीँ,मेरे अश्क ढो रहे होते हैँ। मैँ पत्थर का जरूर हूँ,पर मैँ तुमसा पत्थरदिल नहीँ। मैँ भूल नहीँ पाऊँगा कैसे मेरी उँगली पकड़कर तुमने चलना सीखा था और चलना सीख गए हो तो,अब तुम मुझे छोड़कर जा रहे हो। खैर, अब तुम भी जा रहे हो। चले जाओ,मुझे अफसोस नहीँ होगा। तुम्हेँ क्या बतलाऊँ,कैसे समझाऊँ मैँ तो पहाड़ हूँ मैँ रो भी तो नहीँ सकता। अपनी पीर,मैँ किसी से कह भी तो नहीँ सकता। मैँ तो पहाड़ हूँ। -गौरव लेखनी की नजर से तो यह पँक्तियाँ कच्ची नजर आती हैँ परन्तु क्रपया पहाड़ोँ मेँ बिताए अपने पल,पहाड़ोँ से होते पलायन की कोई दवा जरूर साझा कीजियेगा। —

दीपा कांडपाल

उत्तराखंड पहाड़ के लोगों का पलायन करना ये एक पहाड़ के लिए मुख्य समस्या बनती जा रही है लोगों को पूरी सुख सुविधाए उपलब्ध नहीं होने के कारण पलायन हो रहा है अधिकतर पहाड़ में (जैसे अच्छी शिक्षा रोजग़ार अच्छी चिकित्सा अच्छा रहन सहन आदि) पहले भी लोग कई पलायन कर चुके है जो पहाड़ उत्तराखंड को पूरी तरह छोड़ चुके है शहर विदेश जा कर बस चुके है उनके बच्चों उनकी परवरिश वहीं की है पर अपने उत्तराखंड का वो कुछ भी नहीं जानते की उनका कुछ उत्तराखंड से ही रिश्ता जुड़ा हुआ है कही न कही और अब जो लोग पलायन कर रहे है उनमे से कुछ रोज़गार बेहतर शिक्षा सुख सुविधाओँ के विवश शहर में रहते है ठीक है शहर में रहना पर पूरी तरह अपना गावं घर पहाड़ को नहीं छोड़ना चाहिए लोग अन्य भाषाओँ के दूर दूर से विदेशों से टुरिस्ट बनके हमारे उत्तराखंड आते है घूमने को और होटलों में आके रुकते है क्योँ की उनकी मज़बूरी है हमारी कैसी मज़बूरी शहर में बसे अच्छी बात पर अपने गावं के घर को क्योँ भूल गए जो टूट चुके किसी के तो नामोनिशान तक मिट चुके पूरी तरह सब बंजर पड़ चुके इसलिए पूरी तरह पलायन नहीं करना चाहिए अपने गावं के घर जाना चाहिए जिसका नहीं है वो बनवाए और उत्तराखंड जब जाए टूरिस्ट बनके होटल में नहीं अपने घर गावं जाए रहने को इससे घर गावं आबाद ही रहेंगे और इस समस्या पलायन के निवारण हेतू जो कोई भी शहर में रहते हुए अच्छी शिक्षा अच्छे कार्यलयो अच्छे पद पे कार्यवृत अच्छी जानकारी रखते हो अच्छी योजनाएं बना सकते हो वो यदि अपने पहाड़ के लिए कुछ करना चाहते है भले शहर में रहते हो पर उनको लगता है की वो कुछ कर सकते है उत्तराखंड के विकास के लिए तो उसे आगे बढ़ के पूरी तरह से आना चाहिए जिससे उनकी कोशिशों के जरिए बेहतर सुख सुविधाएं रोज़गार अच्छी शिक्षा चिकित्सा सब वहां के लोगों को उपलब्ध हो सके जिससे आगे लोग पूरी तरह पलायन करने की कभी न सोचें इसलिए कहीं भी रहिए चाहे शहर विदेश उत्तराखंड जाते रहिए अपने खुद के घर गावं पहाड़ अपने बच्चों को भी हमेशा याद दिलाए दिखाए की उनका घर पहाड़ उत्तराखंड ही है जिनसे हम जुड़े हुए है और इस तरह उत्तराखंड का पूरी तरह से नहीं तो कुछ हद तक पलायन बंद हो सकता है और उत्तराखंड हमेशा आबाद रह सकता है !!धन्यवाद !!

Mazhar Ali Bhatt

Live where ever you wish to live but don’t forget our identity. I knew many of them migrated for jobs, opportunities, and business purpose & now they are well settled but money will not give you peace. I just feel spent rest of your life here because here are enormous options for growth ever since its carved out from UP, how many struggle it has seen. So Save it…because u r associated with it….

 

Manoj Bhandari

Manoj Bhandari


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